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सर्वप्रथम शिव ज्ञान को प्रसारित व औरो को लाभान्वित होने की क्रिया श्री नीरज जी के द्वारा एक वाट्सएप पर शिव भक्ति समूह के माध्यम से दिनांक 25 फरवरी 2015 को आरम्भ हुई, जिससे सभी सुपात्र भक्तों ने अपने जीवन में ग्राह्य परिवर्तन अनुभव किया! तदुपरांत इस समूह के भक्तों ने इस समूह पर चलने वाली वार्ताओं व आगे के ज्ञान स्रोतो हेतु व्यापक प्रसार एवं असीमित सुपात्र भक्तों के जीवन मे स्वयं को जानने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक website बनाने हेतु श्रम किया ।। इस स्रोत के जनक एवं सूत्रधार श्री नीरज जी है। अपने अथक श्रम से वे स्वयं व सभी भक्तो के लिए शिव कृपा हेतु प्रयासरत है! ज्ञान के पारलौकिक व लौकिक लाभ की जानकारी होनी चाहिए ! : जो व्यक्ति जीवन में दुखी है और तनाव से ग्रस्त है : उदाहरण किसी प्रिय के साथ कुछ अशुभ हो गया हो तो ज्ञान : सिर्फ़ ज्ञान आपको ऐसी अद्भुत शक्ति देता है कि आप उस पीड़ा को सहन करने का सामर्थ्य पैदा कर लेते हो।। : पारलौकिक लाभ तो सभीको ज्ञात है ! : यदि सही ज्ञान नही है, हम सोचने समझने की शक्ति खो देते है : विवेक से व ज्ञान से नकारात्मक विचार भी शुद्ध हो जाते है। : अंतरवलोकन आपको ज्ञान के प्रकाश में लौकिक व पारलौकिक स्थितियों का विश्लेषण कराता है : ज्ञानियों की संगत करने वाले को हताशा होने की सम्भावना नही होती : ज्ञान सारी ग्रंथियों का शमन करता जाता है, यदि शुद्ध रूप से इस मार्ग पर बढा जाय : ज्ञान की अग्नि में सारी वृत्तियाँ व कर्म भस्म हो जाते है : : इसे ही भगवान ने सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ कहा है आत्म यज्ञ ।। : जो अंततः समाधि में प्रतिष्ठित होता है ।। : ज्ञान अनन्त है, सब कुछ जान लेना सम्भव नही! : पर जो चित्त की जिज्ञासाये है उनके शमन का प्रयास आपको ज्ञान मार्ग पर वहाँ तक ले जाता है, जिसके बाद अंततः कुछ जानने की आवश्यकता नहि रहती : एक ऐसी अनुभूति जो आपको कुछ और जानने की आवश्यकता नहि छोड़ती और परिपूर्ण कर देती है : पर उस अनुभूति को senses समर्थ नही है परिभाषित करने के लिए! : हम सब उस मौन को प्राप्त करने के लिए उस ध्वनि का अनुसरण कर रहे है! : उसके अनुसरण में concentration चाहिए, : नियम चाहिए, श्रद्धा चाहिए : बाक़ी सब स्वतः होगा। : ज्ञान के लिए ज्ञानी की संगत चाहिए : इस संगत मे गुरु भी चाहिये : जो सही मार्गदर्शन के लिए जरूरी है : गुरु दो अक्षर से बना है : गु व रु : गु अर्थात अँधेरा रु अर्थात् हटाने वाला। : सच्चा गुरु वही है जो अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर कर दे। : जितना विकार से दूरी बड़ती जाएगी, उतना गुरुत्व बड़ता जाता है। : गुरु शब्द को सोच समझ के बोलता है, क्योंकि उसके शब्द में गुरुत्व (gravity) होती है : इसमे हमारी श्रधा और विश्वास दृढ़ हो। 🙏🏻 : ज्ञान के आगे की वस्तु परम ज्ञान है पहले ज्ञान प्राप्त करना है उसके अभिमान को त्याग एक ऐसे स्थान पर पहुँचना है जिसके लिए आपका स्व जो ज्ञान के कारण चेतन है वो आपके लिए गुरु का कार्य करेगा ! इसीलिए सांसारिक गुरु एक स्तर तक आपकी मदद कर सकते है उसके आगे आपका शिव तत्व सदगुरु का कार्य करता है !! उद्धरेदात्मनात्मानम नात्मानमवसादयेत। अर्थात् स्वयं से स्वयं का उद्धार कर, तू स्वयं ही अपना शत्रु है और मित्र भी । आँखे होना आपको जगत की लौकिक क्रियाओं का साक्षी नही बनाता है बल्कि उन्मे लिपायमान करता है पर ज्ञानचक्षु आपको सभी क्रियाओं का साक्षी बना देता है।। कैसा भी आकर्षण हो, रूप का, सत्ता का, धन का , पद का वह नही फँसता यह भाव ही वस्तुतः ध्यान है! ध्यान में क्या करने का प्रयास किया जाता है? जो हो रहा है, होने दो। साक्षी भाव से ईश्वर अंश अर्थात् स्वयम् को देखो यही ध्यान है और ज्ञान भी कर्म योग कहता है : कुर्वन्नपि न लिप्यते । करता हुआ भी लिप्त नही होना, कर्म तो प्राकृत धर्म है आत्मा का नही । कर्ता भाव से रहित कर्म को सहज कर्म या कार्य कहा गया है! जैसे कमल कीचड़ में रहते हुए भी, उससे लिप्त न होता उसी प्रकार कुर्वन्नपि न लिप्यते ।अर्थात कर्म करते हुए भी लिपायमान न होयें । आत्मा अपने मूल में स्थित रहे, चेतन रहे तो साक्षी भाव जागृत हो जाता है और यह भाव आपको लौकिक कर्म में लिप्त न होने देता है आत्मा का कर्म ही साक्षित्व है!अचेतन हम, दैहिक कर्म का आरोपण अज्ञान के कारण स्वयम् पर कर लिपायमान हो जाते है। और यह आरोपन हमें कर्मभोग में फँसाता जाता है ! 🙏🏻 ज्ञानियो के ज्ञान को आत्मसात करने के साथ साथ नीरज जी ने शिव भक्ति समूह के लिए भी श्रम किया है।साथ ही उनके ज्ञान गंगा की अविरल धारा से ज्ञान गंगा के मोतियो को एकत्रित करने का कुछ भक्तो ने प्रयास भी किया है । अब इसी क्रम मे शिवभक्ति की एक नयी दिशा जो बेबसाइट के रूप मे श्री नीरज जी के द्वारा शिवभक्तो के लिए उपलब्ध कराने का प्रयास किया है । : जिन्होंने संकलन किया, उन्होंने अपने साथ साथ औरों के लिए भी कार्य किया ।। : श्री नीरज जी ने अपने उन्नयन के साथ साथ औरोके जीवन उत्थान के लिए भी सोचा जो की बहुत ही परमार्थ का कार्य किया । : यही परमार्थ है : अपने उन्नयन के लिए, अपनी मुक्ति के लिए कार्य करने वाला भी : स्वार्थी है । : पर वह परमार्थी तब बनता है, जब वो दूसरों के अर्थों के लिए भी कार्य करता है।। : मुक्ति नही मिलेगी, यदि उसकी तीव्र इच्छा हो : वो तो निष्काम होने पर ही मिलेगी। : मुक्ति और स्वतंत्रता में शाब्दिक समानता होते हुए भी आध्यात्मिक भिन्नता है ।। : मोक्षम प्राप्त इव। : मुक्ति अप्राप्त नही, प्राप्त की प्राप्ति है। : कई बार कुछ पास में पड़ी वस्तुएँ ढके जाती है पुराने स्टोर में। : नई चीज़ें ज़हन में रहती है, पुरानी का विस्मरण हो जाता है। : ये जो ढक्कन ऊपर आ गए है अज्ञान के. इन कम्बलों को उतार देना ही तो मुक्ति है! : विषयों से मुक्त होना ही तो मुक्ति है। : वेदांत शास्त्री कहते है : जैसे बादलों को चलता देख मूर्ख कहते है कि चंद्रमा चल रहा है, : इसी प्रकार अनित्य देह को चलता देख मूर्ख मानव स्वयम् को देह मान उसके अज्ञान का आरोपण कर लेता है !! : मुक्ति की साधना में ज्ञानसाधना में अद्वैत को ही स्वीकारा जाता है पर : अन्य मार्गों में आरम्भ में द्वैत माना जाता है ! : जैसे बच्चा छाया को देख डर रहा है, उसे दूसरा कोई समझता है ! : ज्ञानी (माँ) बच्चे को समझाते है कि ये तेरी ही छाया है, इससे भय मत खा!! : बाक़ी उस ज्ञान का क्या लाभ जो किसी के कोई काम न आ सके !! : ज्ञान की सार्थकता इसमें है जो लोगों को सार्थक पथ पर लगा सके! अन्यथा स्वार्थ साधक ज्ञान निरर्थक ही तो है। : एक स्थिति ऐसी भी आती है जब : बात ज्ञानी की तो करता है पर व्यवहार अज्ञानी का होता है : वह स्वयं के विचार से ही सम्मोहित होने लगता है! : श्रीगीता जी में भी तो यही स्थिति आती है : जब अर्जुन ज्ञानी की तरह बात करने लगता है, तो कृष्ण टोक देते है उसे! : प्रज्ञावादंश्च भाषसे ! अर्थात जो कह रहे हो, वो हो नही !! : पहले जनक प्रश्न करते है : और जब सुपात्र शिष्य के जीवन में परिवर्तन होने लगा, तो मुनि प्रश्न करते है : ये जानने के लिए, कि कितना परिवर्तन आया ! : यह परिवर्तन में भी सजग रहना है! : सबसे पहले मुनि पूछते है : तेरी धन में रुचि अभी शेष है क्या? : दीन है वह : जो कामनाओं के लिए भटकता रहा, उसे पूरा नही कर सका! अब यह मान्यता आ गयी कि वह स्वयम् उन कामनाओं को प्राप्त नही कर सकता : तो अब लोगों के पास जाता है, देवी देवताओं के पास जाता है! : सोचता है कामना पूरी कर लेगा तो महान बन जाएगा! : पर : ग़लती पे ग़लती कर रहा है वो! : पहली ग़लती कि विषय को प्राप्त करने से कामना समाप्त हो जाएगी। : ऐसा कभी न होगा। : दूसरी कि विषय के प्राप्त होने से आनंद प्राप्त होगा : अगर ऐसा होता तो संसार में सारे विषयी सुखी होते! : जैसे मृग रेगिस्तान में इधर उधर भटकता है, वही हालत विषयों के पीछे भागने वाले की होती है : पहले मृग भ्रम खाता है उसे पानी नही मिलता! फिर भी दूसरी जगह जाता है उधर भी न मिलता : फिर भी तीसरी जगह जाता है : उसी प्रकार हम भी एक विषय : फिर दूसरे विषय : फिर तीसरे विषय : के पीछे : इस भ्रम में आनंद मिलेगा : पर फिर चौथे विषय। : झूठ को सच मान भागते रहते हो और : जीवन अमूल्य जीवन निरुद्देशिय समाप्त हो जाता है : एक अवसर जो स्वर्णिम हो सकता था : एक अवसर जो कई जीवनो को सवार सकता था : अपना जीवन भी न सवार सका : संसार का सबसे बड़ा दुःख क्या है : मृत्यु ? : कभी नही। वो तो अव्श्य्म्भावी है : सबसे बड़ा दुःख यह है, कि मित्र : तेरा जीवन व्यर्थ निकलगया!! : और तू कुछ न कर सका : मुँह में खाया गया लड़डू कोई पेट से निकाल ले : ये काम हो रहा है तुम्हारे साथ : और करने वाले भी तुम स्वयम् हो! : अपने साथ ही सबसे बुरा कर रहे हो! : चेत जाओ! : काल अपनी गति से चल रहा है : सीमित काल ही है तुम्हारे पास : इसे व्यर्थ न गँवाओ! : इस सीमित समय को विवेक के साथ ख़र्च करो! : बहुत समय व्यर्थ गवाँ चुके हो! : अनंत धन होके भी एक श्वास न ख़रीद पाओगे! : काल सीमित है! : जो मरिचका में फँसते है, वो मृग होते है!! : इस संसार की मरिचका से ऊपर उठो! मृग न बनो! : मृग न बनो! : काल रूपी सिंह तुम्हारे जैसे मृगों के लिए घात लगा कर बैठा है !! : मृग न बनो! : पता है क्यों? : क्योंकि यह सब तुम्हारी चेतना की इच्छा है, इसलिए आनंद आ रहा है! : तुम्हारी चेतना यही चाहती है, पर अज्ञान का आरोपण तुम्हें संसार में फँसाता है ! तुमको समय मिला है। चाहे संसार से खेल लो , चाहे स्वयं का ज्ञान ले लो। पहले भी तुम शरीरों में रह कर आए हो, शरीर में मन था। मन की चंचलता और संस्कारो के कारण तुमने फिर शरीर धारण किया है। यदि तुम अभी भी चंचलता मिटा न पाए तो फिर आओगे। कब तक आते रहोगे । : इन्ही परमार्थ के कार्य को आगे बढ़ाने के संकल्प के लिए श्री नीरज जी शिव भक्ति समूह के साथ साथ वेबसाइट के माध्यम से सुपात्र शिवभक्तो के जीवन के उन्नयन हेतु अथक एवं अनवरत प्रयास जारी है । 🙏🏻ऊॅ नमः शिवाय.

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