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Welcome To The ShivGyanPunj

।।ॐ।। ओम नम: शिवाय।- इस स्रोत के जनक एवं सूत्रधार श्री नीरज जी है। अपने अथक श्रम से वे स्वयं व सभी भक्तो के लिए शिव कृपा हेतु प्रयासरत है!

ज्ञान के पारलौकिक व लौकिक लाभ की जानकारी होनी चाहिए !

: जो व्यक्ति जीवन में दुखी है और तनाव से ग्रस्त है : उदाहरण किसी प्रिय के साथ कुछ अशुभ हो गया हो तो ज्ञान : सिर्फ़ ज्ञान आपको ऐसी अद्भुत शक्ति देता है कि आप उस पीड़ा को सहन करने का सामर्थ्य पैदा कर लेते हो।। : पारलौकिक लाभ तो सभीको ज्ञात है ! : यदि सही ज्ञान नही है, हम सोचने समझने की शक्ति खो देते है : विवेक से व ज्ञान से नकारात्मक विचार भी शुद्ध हो जाते है। : अंतरवलोकन आपको ज्ञान के प्रकाश में लौकिक व पारलौकिक स्थितियों का विश्लेषण कराता है : ज्ञानियों की संगत करने वाले को हताशा होने की सम्भावना नही होती : ज्ञान सारी ग्रंथियों का शमन करता जाता है, यदि शुद्ध रूप से इस मार्ग पर बढा जाय : ज्ञान की अग्नि में सारी वृत्तियाँ व कर्म भस्म हो जाते है : : इसे ही भगवान ने सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ कहा है आत्म यज्ञ ।। : जो अंततः समाधि में प्रतिष्ठित होता है ।। : ज्ञान अनन्त है, सब कुछ जान लेना सम्भव नही! : पर जो चित्त की जिज्ञासाये है उनके शमन का प्रयास आपको ज्ञान मार्ग पर वहाँ तक ले जाता है, जिसके बाद अंततः कुछ जानने की आवश्यकता नहि रहती : एक ऐसी अनुभूति जो आपको कुछ और जानने की आवश्यकता नहि छोड़ती और परिपूर्ण कर देती है : पर उस अनुभूति को senses समर्थ नही है परिभाषित करने के लिए! : हम सब उस मौन को प्राप्त करने के लिए उस ध्वनि का अनुसरण कर रहे है! : उसके अनुसरण में concentration चाहिए, : नियम चाहिए, श्रद्धा चाहिए : बाक़ी सब स्वतः होगा। : ज्ञान के लिए ज्ञानी की संगत चाहिए : इस संगत मे गुरु भी चाहिये : जो सही मार्गदर्शन के लिए जरूरी है : गुरु दो अक्षर से बना है : गु व रु : गु अर्थात अँधेरा रु अर्थात् हटाने वाला। : सच्चा गुरु वही है जो अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर कर दे। : जितना विकार से दूरी बड़ती जाएगी, उतना गुरुत्व बड़ता जाता है। : गुरु शब्द को सोच समझ के बोलता है, क्योंकि उसके शब्द में गुरुत्व (gravity) होती है : इसमे हमारी श्रधा और विश्वास दृढ़ हो।




    ज्ञान के आगे की वस्तु परम ज्ञान है पहले ज्ञान प्राप्त करना है उसके अभिमान को त्याग एक ऐसे स्थान पर पहुँचना है जिसके लिए आपका स्व जो ज्ञान के कारण चेतन है वो आपके लिए गुरु का कार्य करेगा ! इसीलिए सांसारिक गुरु एक स्तर तक आपकी मदद कर सकते है उसके आगे आपका शिव तत्व सदगुरु का कार्य करता है !! उद्धरेदात्मनात्मानम नात्मानमवसादयेत। अर्थात् स्वयं से स्वयं का उद्धार कर, तू स्वयं ही अपना शत्रु है और मित्र भी । आँखे होना आपको जगत की लौकिक क्रियाओं का साक्षी नही बनाता है बल्कि उन्मे लिपायमान करता है पर ज्ञानचक्षु आपको सभी क्रियाओं का साक्षी बना देता है।। कैसा भी आकर्षण हो, रूप का, सत्ता का, धन का , पद का वह नही फँसता यह भाव ही वस्तुतः ध्यान है! ध्यान में क्या करने का प्रयास किया जाता है? जो हो रहा है, होने दो। साक्षी भाव से ईश्वर अंश अर्थात् स्वयम् को देखो यही ध्यान है और ज्ञान भी कर्म योग कहता है : कुर्वन्नपि न लिप्यते । करता हुआ भी लिप्त नही होना, कर्म तो प्राकृत धर्म है आत्मा का नही । कर्ता भाव से रहित कर्म को सहज कर्म या कार्य कहा गया है! जैसे कमल कीचड़ में रहते हुए भी, उससे लिप्त न होता उसी प्रकार कुर्वन्नपि न लिप्यते ।अर्थात कर्म करते हुए भी लिपायमान न होयें । आत्मा अपने मूल में स्थित रहे, चेतन रहे तो साक्षी भाव जागृत हो जाता है और यह भाव आपको लौकिक कर्म में लिप्त न होने देता है आत्मा का कर्म ही साक्षित्व है!अचेतन हम, दैहिक कर्म का आरोपण अज्ञान के कारण स्वयम् पर कर लिपायमान हो जाते है। और यह आरोपन हमें कर्मभोग में फँसाता जाता है !....

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Maha Shivratrari

Maha Shivratri Muhurta The Chaturdashi tithi will begin at 9.38 pm on February 24 and it will end at 9.20 pm on February 25. Nishita Kaal Puja Time = 12:08 am to 12:59 am on Feb 25 Ratri First Prahar Puja Time = 6:13 pm to 9:23 pm Ratri Second Prahar Puja Time = 21:23 pm to 12:33 am Ratri Third Prahar Puja Time = 12:33 am to 3:44 am Ratri Fourth Prahar Puja Time = 3:44 am to 6:54 am On 25th, Maha Shivaratri Parana Time = 06:54 am to 3:24 pm .

ज्योतिर्लिंग स्तुति मंत्र

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्. उज्जयिन्यां महाकालमोंकारं परमेश्वरम्॥ केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकियां भीमशंकरम्. वाराणस्यांच विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे॥ वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारूकावने. सेतूबन्धे च रामेशं घुश्मेशंच शिवालये॥ द्वादशैतानि नामानि प्रातरूत्थाय यः पठेत्. सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥ यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः. तस्य तस्य फलप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः॥.

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